‘सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर’ कार्यक्रम सम्पन्न
स्वर्गीय एम. ए. सिद्दीक़ी एवं बघेली कवि स्वर्गीय जगदीश पयासी को समर्पित रहा साहित्यिक आयोजन
उमरिया। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्वावधान में ज़िला अदब गोशा उमरिया एवं शहडोल द्वारा रविवार, 1 नवंबर 2026 को प्रातः 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक वीणा पैलेस, उमरिया में ‘सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
यह साहित्यिक आयोजन स्वर्गीय ग़ज़लकार एम. ए. सिद्दीक़ी एवं विंध्य की धरती के सुप्रसिद्ध बघेली कवि स्वर्गीय जगदीश पयासी की स्मृति एवं साहित्यिक योगदान को समर्पित रहा। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेंहदी ने अपने संदेश में कहा कि साहित्य समाज की संवेदनाओं, विचारों और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम है। स्वर्गीय एम. ए. सिद्दीक़ी और स्वर्गीय जगदीश पयासी जैसे साहित्यकारों का रचनात्मक अवदान हमारी साहित्यिक धरोहर का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी स्मृति में आयोजित ऐसे कार्यक्रम न केवल उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य भी करते हैं। ‘सिलसिला’ और ‘तलाश-ए-जौहर’ जैसे आयोजन साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने तथा विभिन्न भाषाओं और अभिव्यक्तियों के बीच संवाद एवं सौहार्द स्थापित करने की दिशा में सार्थक पहल हैं।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में उपस्थित अनिल मिश्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सांस्कृतिक परंपराओं में उर्दू भाषा और साहित्य के विशेष महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने साहित्य को सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक समन्वय का माध्यम बताया। उन्होंने स्वर्गीय एम. ए. सिद्दीक़ी एवं स्वर्गीय जगदीश पयासी के साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि ऐसे रचनाकार अपनी भाषा और क्षेत्र की साहित्यिक पहचान को समृद्ध करते हैं तथा उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहती हैं।
कार्यक्रम का संचालन उमरिया ज़िला समन्वयक शारिब पूर्वांचली ने किया। शहडोल ज़िला समन्वयक शाद अहमद ‘शाद’ के विशेष सहयोग एवं समन्वय से कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
काव्य-पाठ में उमरिया के रचनाकारों की सहभागिता
उमरिया से कुलदीप कुमार ने रौशनी के प्रतीकात्मक अर्थ को अभिव्यक्त करते हुए कहा—
“देखने वाले उसे रौशनी कह देते हैं,
मरती आँखों से जो इक चीज़ रिहा होती है।”
राजकुमार महोबिया ने ‘झूठ की बंदगी नहीं होती’ ग़ज़ल प्रस्तुत की। श्री तन्मय मिश्रा ने दुनियावी झमेलों से दूर होने की अनुभूति को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—
“दुनियावी झमेले से कहीं दूर बहुत दूर,
मैं हूँ भी तो इस जिस्म की बस्ती में नहीं हूँ।”
श्रीमती रंजना गौतम ने वफ़ा और प्रेम की तस्वीर प्रस्तुत करते हुए कहा
“रंग-ए-वफ़ा निगाहों में भरकर बनाइए,
तस्वीर अपनी जब किसी दिल पर बनाइए।”
सुख निधान मिश्र ने अपनी पंक्तियों में आत्मचिंतन और अस्तित्व की तलाश को स्वर दिया—
“किसमें-किसमें शुमार हो जाऊँ,
क्या करूँ, क्या हज़ार हो जाऊँ।”
श्री शिवानंद पटेल ने बदलते पर्यावरण और दूषित होती आबोहवा पर अपनी रचना प्रस्तुत की—
“ना वो मौसम रहा, ना फ़िज़ा वो रही,
हर तरफ़ ही तो दूषित हवा हो रही।”
भूपेंद्र त्रिपाठी ने सामाजिक दायरों से बाहर निकलकर व्यापक मानवीय दृष्टि और भाईचारे का संदेश दिया—
“निकलकर इन गठरियों से चलो दायरा बढ़ाने हम,
पोथियाँ पुरानी ही सही, नया चश्मा चढ़ा लें हम।
कब तलक चिपके रहेंगे बेवजह इन लकीरों से,
इस जहाँ में हैं सभी अपने, भाईचारा निभा लें हम।”
अजय द्विवेदी ने भी अपनी रचनात्मक सहभागिता से आयोजन को समृद्ध किया। शहडोल के रचनाकारों ने भी बाँधा समाँ। शहडोल के ज़िला समन्वयक शाद अहमद ‘शाद’ ने मुफ़लिसी और सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण करते हुए कहा—
“मुफ़लिसों के सब मकान ढह गए,
हम ये मंज़र देखते ही रह गए।”
राजिंदर सिंह ‘राज’ ने ज़ुबान की अहमियत और उसकी क़द्र को इन शब्दों में प्रस्तुत किया—
“जो समझेगा ये अहलियत ज़ुबाँ की,
कमाएगा वही दौलत ज़ुबाँ की।”
श्रीमती छाया गुप्ता ने आशा और जीवन की सुंदरता को स्वर देते हुए कहा—
“काश! ऐसी कोई सहर आए,
सूरत-ए-ज़िंदगी नज़र आए।”
शारिब पूर्वांचली ने अपने सूफ़ियाना अंदाज़ में ग़ज़ल के माध्यम से कहा -
"ख़ुदी को भूलकर जाता कहाँ है देखने काबा,
अगर दिल में बसा काबा नहीं देखा तो क्या देखा!"
रजनीश सोनी ने अदब, लिहाज़ और मानवीय व्यवहार पर अपनी रचना प्रस्तुत की—
“अदब-ओ-लिहाज़ ‘नेह’ तरीके से आदमी,
बेवक़्त बात कब भली मज़ाकिया लगे।”
सी. एल. मिश्र ‘साहिल’ ने ग़ज़ल की रचनात्मक साधना और उसके पीछे के परिश्रम को अभिव्यक्त करते हुए कहा—
“ग़ज़ल यूँ ही नहीं बनती, पसीने छूट जाते हैं।”
श्रीमती रेणु श्रीवास्तव ने नेकी और उसके प्रतिफल की अनुभूति को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—
“ज़ियादा तो कभी कम-कम मिला है,
सिला नेकी का तो हरदम मिला है।”
श्री दुर्गा शंकर श्रीवास्तव ने समकालीन परिस्थितियों पर अपनी रचना के माध्यम से कहा—
“आज के हालात से जो बेख़बर हो जायेंगे,
वो यहाँ हर हाल में ही पुरख़तर हो जायेंगे।”
अभिषेक श्रीवास्तव ‘शिवा’ ने जीवन के संघर्षों और पीड़ा के बीच मुस्कुराने की विवशता को अभिव्यक्त किया—
“ये न पूछो कि क्या-क्या छिपाना पड़ा,
चोट खाकर हमें मुस्कुराना पड़ा।”
स्वर्गीय जगदीश पयासी के सुपुत्र नरेंद्र पयासी और स्वर्गीय एम. ए. सिद्दीक़ी साहब के सुपुत्र इनायत सिद्दीकी साहब का भी सम्मान किया गया।
कार्यक्रम में स्थानीय एवं क्षेत्रीय साहित्यकारों की रचनात्मक सहभागिता ने साहित्यिक वातावरण को जीवंत बनाया। बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमियों एवं श्रोताओं की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। श्रोताओं ने काव्य-पाठ का आनंद लिया और रचनाकारों की प्रस्तुतियों के प्रति उत्साहपूर्ण सहभागिता व्यक्त की। शहडोल ज़िला समन्वयक शाद द्वारा आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से किया गया। कार्यक्रम में श्रोताओं में हिन्दी साहित्यकारों की भी विशेष उपस्थिति रही। सुभाष, नीर, शेख़ धीरज, किशोर नामदेव, के जी पाण्डेय, आफ़ताब खान एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।
सिलसिला एवं तलाश-ए-जौहर’ के माध्यम से साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण, नवोदित प्रतिभाओं को प्रोत्साहन तथा उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य के बीच संवाद एवं समन्वय की दिशा में एक सार्थक प्रयास किया गया।
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