बोलेरो और पिकअप के नाम पर मोटरसाइकिल का हुआ भुगतान..!
मुख्यमंत्री के गुरुवाही दौरे के नाम पर धनवाही पंचायत की कारस्तानी, सचिव को नहीं हैं जानकारी.!
उमरिया। सरकारी खजाने में सेंधमारी उसके तकवार ही कर रहे हैं। जिले की पंचायतों में फैले भ्रष्टाचार की जड़ ने सिस्टम की पारदर्शी व्यवस्था औद जनपद से लेकर जिले तक बैठे प्रशासनिक सेवकों के कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकारी पैसे का हिसाब देखा जाए, तो पंचायतों में अक्सर कागजों का खेल सामने आने लगता है। ऐसा ही एक मामला करकेली जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत धनवाही से सामने आया है, जहां 14 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गुरुवाही दौरे के दौरान ग्रामीणों को कार्यक्रम स्थल तक ले जाने के नाम पर दोपहिया वाहनों का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है। और सचिव को भुगतान से संबंधित जानकारी न होना और बाद में उसे दिखवाने का दावा कई प्रश्न चिन्ह खड़े कर रहा है। सवाल ये है कि आखिर सिस्टम की निगरानी कर कौन रहा है ? या फिर भ्रष्टाचार का खुला संरक्षण ही अब शिष्टाचार में सेट करने की कवायद की जा रही है।
क्या है मामला
मुख्यमंत्री के गुरुवाही दौरे पर स्थल तक पंचायत के जिम्मेदारों को ग्रामीणों के पहुंचने के लिए व्यवस्था मुहैया कराने का निर्देश दिया गया। जिसमें कई पंचायतों ने वाहनों को भेजा, लेकिन करकेली जनपद की धनवाही पंचायत से लगभग पांच वाहनों का भुगतान किया गया, जिसमें दो पहिया वाहन भी शामिल हैं। मिली जानकारी के अनुसार ग्रामीणों को ले जाने के लिए मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल किया गया। इनमें MP-17-ZA-1482 और MP-54-ZC-1817 नंबर के वाहन बताए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि दोपहिया वाहनों को बोलेरो और पिकअप वाहन के नाम पर तीन हजार और चार हजार नौ सौ रुपये की राशि का भुगतान किया गया। वहीं कुछ अन्य बोलेरो वाहनों पर 4900 रुपये तक का भुगतान दर्शाया गया है। कुल पांच बिलों के जरिए 20700/- रुपये की राशि खर्च किए जाने की जानकारी सामने आई है।
तो क्या मोटरसाइकिल से भेजे गए नागरिक
नागरिकों को ले जाने के लिए बस और चार पहिया वाहन से ढोया जा सकता है, लेकिन दो पहिया वाहन से आखिरकार कितने लोगों को भेजा गया यह समझ से परे है। अब सवाल यह है कि दोपहिया वाहनों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों को ले जाना संभव था या फिर कागजों में ही वाहन दौड़ाकर पंचायत की राशि का भुगतान दर्शा दिया गया। क्योंकि बिल में जिन नम्बरों को भरकर भुगतान किया गया, वह दो पहिया के हैं और बिल में बोलेरो लिखा गया। पूरे मामले में सन्देहास्पद यही है कि जिन वाहनों को बोलेरो बताकर भुगतान किया गया, वे वास्तव में मोटरसाइकिल हैं तो फिर ग्रामीणों को कार्यक्रम स्थल तक ले जाने की व्यवस्था कैसे हुई ? क्या मोटरसाइकिलों से ग्रामीणों को ढोया गया या फिर वाहन के नाम और बिलों में ही हेरफेर कर दिया गया। मौके पर पहुंचने वाले वाहनों के सत्यापन और भुगतान की अनुमति के आधार पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सरकारी धन पर लूट का नया तरीका
पंचायत में विकास कार्यों के लिए पैसों की कमी का रोना रोया जाता है, वहीं दूसरी ओर दौरे के नाम पर दोपहिया वाहनों के बिलों में हजारों रुपये खर्च होने की जानकारी सामने आ रही है। आखिर इस खर्च का वास्तविक आधार क्या है। ऐसा लगता है कि न मापदंड हैं और न ही नैतिक जिम्मेदारी। जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारियों की कार्यशैली सिस्टम को खोखला करने में जुटे हैं।
जांच हुई तो खुल सकती है भुगतान की परतें
सरकारी राशि के खर्च का आधार बिल और वास्तविक वाहन होने चाहिए, लेकिन धनवाही पंचायत के इस मामले में दोनों के बीच अंतर नजर आने की बात सामने आ रही है। अब जनपद और जिला पंचायत के अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वाहन नंबर, बिल, भुगतान रिकॉर्ड और कार्यक्रम स्थल पर वाहनों की मौजूदगी की जांच करें। सवाल यह भी है कि यदि दोपहिया वाहनों के नाम पर बोलेरो का भुगतान हुआ है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी। और कार्यवाही को लेकर क्या ठोस कदम उठाया जाएगा।
इन्होंने कहा -
सरपंच साहब से पूंछती हूँ। अभी भुगतान ही नहीं हुआ है। जब टू व्हीलर ले ही नहीं गए तो उसका भुगतान क्यों करेंगे। गलत जानकारी दी गई है। -शिखा गुप्ता, सचिव, ग्राम पंचायत धनवाही
उनको परिवहन व्यवस्था के लिए अपने स्तर से व्यवस्था करके ग्रामीणों को ले जाने के लिए कहा गया था। टू व्हीलर कोई कॉमर्शियल वाहन तो है नहीं, भुगतान के मामले में मैं दिखवाता हूँ। -डॉ प्रभांशु सिंह, सीईओ जनपद करकेली सह अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत उमरिया*
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