खिलाडिय़ों की थाली पर शिक्षा विभाग का डाका उमरिया में राष्ट्रीय हैंडबॉल स्पर्धा बनी कुप्रबंधन का अखाड़ा
उमरिया। जिले में आयोजित 70 वीं शालेय राष्ट्रीय हैंडबॉल प्रतियोगिता खेल प्रतिभाओं के प्रदर्शन से अधिक, आयोजक ‘शिक्षा विभाग’ की घोर प्रशासनिक नाकामी, भ्रष्टाचार और बेपरवाही के कारण विवादों के भंवर में फंस गई है। देश के विभिन्न राज्यों से आए उदीयमान खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन और सम्मान देने के बजाय शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों ने उन्हें बदहाली और अपमान के सिवाय कुछ नहीं दिया। राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में व्यवस्थाओं का जिस प्रकार जनाजा निकला है, उसने विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली और नीयत को पूरी तरह नंगा कर दिया है। होटल में शरण लेने को मजबूर खिलाड़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुँची हरियाणा टीम के कोच आकाश जाखड़ ने स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया और आयोजक शिक्षा विभाग के दावों की हवा निकाल दी है। कोच ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाडिय़ों को जो भोजन परोसा जा रहा है, वह न तो गुणवत्ता के मापदंडों पर खरा उतरता है और न ही इंसान के खाने योग्य है। आयोजकों की इस घोर बेरुखी का आलम यह है कि खिलाडिय़ों को अपना पेट भरने के लिए जेब खाली करके निजी होटलों का रुख करना पड़ रहा है। क्या देश के लिए पदक जीतने का सपना लेकर आए खिलाडिय़ों के साथ ऐसा सुलूक जायज है? सवाल उठना लाजमी है कि कागजों में पोषण और गुणवत्ता का ढिंढोरा पीटने वाले शिक्षा विभाग के साहबान आखिर किसकी शह पर खिलाडिय़ों के निवाले पर डाका डाल रहे हैं?
कमीशनखोरी का पुराना खेल
उमरिया में खेल आयोजनों के नाम पर घटिया व्यवस्था और भोजन को लेकर घपलेबाजी का यह कोई पहला मामला नहीं है। अतीत में भी शिक्षा विभाग द्वारा आयोजित विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं के दौरान भोजन, आवास और बुनियादी सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। लेकिन कुंभकर्णी नींद में सो रहे विभागीय अधिकारियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन के लिए स्वीकृत भारी-भरकम बजट खिलाडिय़ों की सुविधाओं पर खर्च होने के बजाय अफसरों और ठेकेदारों की जेबें गर्म करने में ही स्वाहा हो गया है।
भेदभाव का जहर और खोखले प्रशासनिक दावे
हरियाणा टीम के कोच ने शिक्षा विभाग पर दोहरा रवैया अपनाने और विभिन्न राज्यों से आई टीमों के साथ सौतेला व्यवहार करने का भी गंभीर आरोप लगाया है। जहाँ एक ओर खेल भावना निष्पक्षता का संदेश देती है, वहीं उमरिया में आयोजकों ने पक्षपात और कुप्रबंधन की दीवारें खड़ी कर दी हैं। चहेतों के लिए वातानुकूलित इंतजाम और विशेष आवभगत की जा रही है, जबकि पसीना बहाने वाले खिलाडिय़ों को दो समय की सम्मानजनक रोटी के लिए भी तरसाया जा रहा है। जब खिलाडिय़ों का मानसिक ध्यान खेल पर केंद्रित होने के बजाय भुखमरी और अव्यवस्था से जूझने में लगा रहेगा, तो वे मैदान पर क्या खाक प्रदर्शन करेंगे? शिक्षा विभाग ने खेल प्रतियोगिता को तमाशे और बजट ठिकाने लगाने के माध्यम में तब्दील कर दिया है।
कब तय होगी अधिकारियों की जवाबदेही
यह समूचा प्रकरण साबित करता है कि शिक्षा विभाग के लिए यह आयोजन केवल एक औपचारिक रस्म अदायगी था। अब देखना यह है कि इस गंभीर जनआक्रोश और तीखे खुलासों के बाद क्या उच्च प्रशासनिक अधिकारी नींद से जागेंगे और दोषी कर्मचारियों व ठेकेदारों पर कार्रवाई की गाज गिरेगी या फिर हर बार की तरह लीपापोती की रद्दी फाइल बनाकर मामले को दबा दिया जाएगा? यदि समय रहते व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया, तो उमरिया का नाम राष्ट्रीय खेल इतिहास में एक काले पन्ने के रूप में दर्ज हो जाएगा।
What's Your Reaction?