बांधवगढ़ की धडक़न ‘डॉटी’ का अंत जंगल में सूना छोड़ गई अपनी सल्तनत
15 महीने के दो मासूम शावकों की तलाश में जुटी वन विभाग की टीम
उमरिया। विंध्य के घने जंगलों और खासकर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की शान कही जाने वाली लोकप्रिय बाघिन ‘डॉटी’ अब इस दुनिया में नहीं रही, अपनी खास पहचान और बाड़े के इतिहास में एक अनूठा अध्याय लिखने वाली इस महरानी बाघिन की जीवन यात्रा आखिरकार थम गई है। मानपुर बफर रेंज के मझखेता बीट में उसका शव मिलने से वन्यजीव प्रेमियों और पार्क प्रबंधन में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रारंभिक तौर पर अधिकारियों ने मौत की वजह प्राकृतिक बताई है, लेकिन मौत के असली रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए बिसरा और अन्य जरूरी नमूने फॉरेंसिक लैब भेजे गए हैं। डॉटी के इस अचानक दुनिया से चले जाने के बाद उसके पीछे करीब 15 से 16 महीने के दो नन्हें शावक बेसहारा हो गए हैं, जिनकी सुरक्षा और तलाश अब पार्क प्रबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। ये दोनों शावक अपनी मां के शव के आसपास भी नजर नहीं आए, जिससे उनकी स्थिति को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं।
हाथी गश्त के दौरान हुआ खुलासा
घटना का खुलासा तब हुआ जब वन विभाग की टीम हाथी पर सवार होकर नियमित गश्त कर रही थी। अचानक नजर पड़ी तो बाघिन का शव दिखाई दिया, जिसके बाद आनन-फानन में पूरे इलाके की घेराबंदी कर वरिष्ठ अधिकारियों को इत्तिला दी गई। प्रोटोकॉल के तहत उसी शाम डॉग स्क्वाड को मैदान में उतारा गया और घटनास्थल के चप्पे-चप्पे की सघन जांच कराई गई, गनीमत यह रही कि जांच में किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि या शिकार के साक्ष्य सामने नहीं आए। इसके बाद शनिवार को वन्यजीव स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों के दल ने वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पोस्टमार्टम की कार्रवाई पूरी कर शव का विधिवत अंतिम संस्कार कर दिया।
मशहूर पटिहा और ब्लू आई की संतान थी डॉटी, पीढिय़ों को सींचा
वन इतिहास के पन्नों को पलटें तो डॉटी का जन्म 2011-12 के दौरान मगधी जोन की प्रसिद्ध पटिहा मादा और ब्लू आई नर के घर हुआ था। बांधवगढ़ के जंगलों में उसने लंबा और शानदार सफर तय किया। अपने जीवनकाल में उसने तीन से चार बार शावकों को जन्म दिया और उन्हें पूरी तरह पाल-पोसकर जंगल में स्थापित किया। उसकी संतानों ने भी बांधवगढ़ के टाइगर किंगडम में अपनी मजबूत धाक जमाई है। वक्त के पहिए ने ऐसा चक्र घुमाया कि अपनी ही एक मादा संतान से क्षेत्र के आधिपत्य को लेकर उपजे संघर्ष के बाद डॉटी ने ताला जोन में अपना नया आशियाना बनाया और वहां भी दो नए शावकों को जन्म दिया। डॉटी सिर्फ एक बाघिन का नाम नहीं था, बल्कि बांधवगढ़ के जंगलों में वन्यजीव संरक्षण और पीढिय़ों के विस्तार की एक जीवंत कहानी थी। उसकी विरासत अब उसकी उन संतानों के रूप में जंगल में मौजूद है, जो उसकी सीख के साथ बड़े हो रहे हैं।
बहरहाल, मां के आंचल से महरूम हुए उन दो युवा शावकों पर अब पार्क प्रबंधन की आंखें टिकी हैं। उनकी हर एक गतिविधि और सुरक्षा पर हाथियों व कैमरों के जरिए कड़ी निगरानी रखी जा रही है, ताकि जंगल के ये नए वारिस सुरक्षित रह सकें।
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