बाल श्रम के खिलाफ चलाया गया विशेष अभियान
नर्मदापुरम। कलेक्टर सुश्री सोनिया मीना के निर्देशानुसार बाल श्रम की पहचान एवं विमुक्ति के उद्देश्य से गुरुवार को पिपरिया शहर में संयुक्त जन-जागरूकता अभियान चलाया गया। अभियान श्रम विभाग के नेतृत्व में पुलिस विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा शिक्षा विभाग के सहयोग से संचालित किया गया।
अभियान के तहत विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। मंगलवारा चौराहा स्थित एक पिचकारी दुकान पर एक किशोर श्रमिक कार्यरत पाया गया। श्रम निरीक्षक सुश्री सरिता साहू द्वारा बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए संबंधित बाल श्रमिक को दो दिनों के कार्य की मजदूरी राशि 1000 रुपये (एक हजार मात्र) का भुगतान कराया गया।
इसके पश्चात टीम द्वारा रायखेड़ी टोला स्थित ईंट-भट्टों का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान मजदूर परिवार सहित निवासरत पाए गए। अधिकारियों द्वारा मजदूरों के बच्चों को आंगनबाड़ी एवं विद्यालय भेजने के निर्देश दिए गए। सुपरवाइजर श्रीमती मंजूला जैन दुबे ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संजू मालवीय को बच्चों को आंगनबाड़ी से जोड़ने हेतु आवश्यक कार्रवाई करने को कहा।
प्रजापति ईंट-भट्टा, रायखेड़ी टोला पर 12 वर्ष 10 माह आयु की एक बाल श्रमिक कार्यरत पाई गई। इस पर श्रम निरीक्षक सुश्री सरिता साहू द्वारा बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत विधिसम्मत कार्रवाई की गई तथा बाल श्रमिक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
इस संयुक्त कार्रवाई में श्रीमती मंजूला जैन दुबे (सुपरवाइजर, पिपरिया), श्री अजीज खान (जन शिक्षक, पिपरिया), श्री नरेन्द्र सिंह तोमर (प्रधान आरक्षक, मंगलवारा थाना पिपरिया), श्री भुजराम सिंह (SJPU, इटारसी), आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संजू मालवीय एवं सहायिका रेखा अहिरवार सहित संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत 14 वर्ष तक के बालकों का किसी भी प्रकार के कार्य में नियोजन पूर्णतः प्रतिबंधित है। वहीं 14 से 18 वर्ष तक के किशोरों को खतरनाक श्रेणी के कार्यों जैसे ज्वलनशील पदार्थ, विस्फोटक सामग्री एवं अन्य परिसंकटमय प्रक्रियाओं में नियोजित करना कानूनन अपराध है।
अधिनियम के उल्लंघन की स्थिति में दोषी नियोजक के विरुद्ध न्यूनतम 6 माह से अधिकतम 2 वर्ष तक का कारावास अथवा न्यूनतम 20,000 रुपये से अधिकतम 50,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों दंड का प्रावधान है।
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