भस्मासुर बने रेत माफिया, अब रक्षकों को ही निगलने की तैयारी!
उमरिया। जिले में कानून का इकबाल खत्म हो चुका है या फिर माफियाओं ने उसे अपनी जेब में गिरवी रख दिया है? चंदिया वन परिक्षेत्र के सलैया में लगातार दूसरे दिन जो तमाशा हुआ, वह प्रशासन के मुंह पर करारा तमाचा है। कल तक जो रेत चोर अंधेरे का फायदा उठाकर भागते थे, आज वे दिनदहाड़े वर्दीधारियों को घेरकर उन्हें उनकी औकात बता रहे हैं।
वर्दी बेबस, माफिया बेखौफ
बीते दिनों वनरक्षक रामशंकर के साथ जातिसूचक गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि सोमवार को माफियाओं ने अपना असली रंग दिखा दिया। जब रेंजर नीलेश द्विवेदी के नेतृत्व में टीम ट्रैक्टर जब्त करने पहुंची, तो पूरे गांव को ढाल बनाकर माफियाओं ने टीम को बंधक बनाने जैसी स्थिति पैदा कर दी। सूत्रों की मानें तो मौके पर अफरा-तफरी का आलम यह था कि सरकारी नुमाइंदे अपनी जान बचाने की जुगत में थे। हालांकि, टीम ने साहस दिखाते हुए एक ट्रैक्टर जब्त कर लिया, लेकिन यह सवाल जस का तस खड़ा है कि इन गुंडों को इतनी हिम्मत दे कौन रहा है?
अवैध कारोबार का साइलेंट पार्टनर
जिले में रेत और मुरूम का अवैध उत्खनन कोई रहस्य नहीं है। खनिज विभाग के साहबान वातानुकूलित कमरों में बैठकर फाइलों पर सब ठीक है की मुहर लगाते रहे और इधर माफियाओं की जड़ें पाताल तक पहुंच गईं। जिले के चप्पे-चप्पे पर नदियों का सीना छलनी हो रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि सरकारी निर्माण कार्यों से लेकर निजी प्रोजेक्ट्स तक में इसी अवैध रेत और मुरूम की खपत ऑन रिकॉर्ड चल रही है। खनिज विभाग की चुप्पी ने आज उन भस्मासुरों को जन्म दिया है, जिन्हें विभाग ने ही अपने वरदहस्त से पाला-पोसा था। अब ये भस्मासुर उन्हीं हाथों को जलाने पर आमादा हैं, जिन्होंने इन्हें संरक्षण दिया।
माफिया की कमर तोडऩे का अचूक नुस्खा
प्रशासन अगर वाकई अपनी साख बचाना चाहता है, तो उसे भारी भरकम फोर्स की जरूरत नहीं है। बस एक छोटी सी ईमानदारी की दरकार है। जिले में चल रहे बड़े-छोटे शासकीय निर्माण कार्यों में उपयोग हो रहे खनिज की रॉयल्टी पर्चियों की बारीकी से जांच शुरू कर दी जाए। अगर रॉयल्टी और उपयोग की गई सामग्री का मिलान हो जाए, तो दूध का दूध और रेत का रेत अलग हो जाएगा। माफियाओं और उन्हें पर्दे के पीछे से संरक्षण देने वाले सफेदपोशों के गले में नकेल कसने का यही एकमात्र तरीका है।
जिम्मेदार कौन?
क्या कलेक्टर और एसपी साहब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कोई बड़ी अनहोनी हो जाए, सलैया की घटना केवल एक झड़प नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की विफलता का प्रमाण है। जब रक्षक ही सुरक्षित नहीं, तो आम जनता किससे उम्मीद करे। अब गेंद प्रशासन के पाले में है या तो वे इन भस्मासुरों का अंत करें या फिर अपनी वर्दी उतारकर माफियाओं की गुलामी स्वीकार कर लें।
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