अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा के तर्ज पर जिले में नए महाविद्यालयों की दुर्दशा, एक वर्ष बीतने के बाद भी भवन और स्टाफ नदारद

उमरिया। एन.एस.यू.आई. जिला अध्यक्ष मो. असलम शेर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि महाविद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जिले में वर्ष 2024-25 में दो नए शासकीय महाविद्यालयों भरेवा और बिलासपुर की स्थापना की गई थी, लेकिन एक साल बीत जाने के बावजूद यहां न तो भवन निर्माण हुआ और न ही शिक्षकों और स्टाफ की भर्ती की गई। यह स्थिति छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ के समान है। बिना उचित संसाधनों और शिक्षकों के, छात्रों की शिक्षा अधूरी रह गई है। बिलासपुर महाविद्यालय में 2 लोगों का स्टाफ है जबकि भरेवा महाविद्यालय में 1 स्टाफ वर्तमान समय में मौजूद है। वही परीक्षा नजदीक है, पर पढ़ाई अधूरी हुई। अब जब प्रथम वर्ष के स्नातक छात्रों की परीक्षाएं नजदीक हैं, तब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे कैसे परीक्षा देंगे? बिना नियमित कक्षाओं और पाठ्यक्रम के व्यवस्थित अध्ययन के, उनकी एक वर्ष की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हुई है। छात्रों का कहना है कि प्रशासन और सरकार की अनदेखी के कारण उनका पूरा शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो गया। जबकि बिना कंप्यूटर के संचालित हो रही कंप्यूटर साइंस की कक्षाएं। दोनों महाविद्यालय में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के सभी पद वर्तमान समय तक रिक्त है। इन रिक्त पदों में कब होगी भर्ती?
एन.एस.यू.आई. जिला अध्यक्ष मो. असलम शेर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि यह स्थिति छात्रों के साथ अन्याय है। उन्होंने सरकार और कॉलेज प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा, "एक साल बीतने के बाद भी न तो भवन निर्माण हुआ, न शिक्षकों की भर्ती हुई, न ही छात्रों को उचित संसाधन मिले। आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? क्या सरकार और प्रशासन छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं?
उन्होंने आगे कहा कि यदि जल्द से जल्द इन महाविद्यालयों में भवन निर्माण, शिक्षकों की भर्ती और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, तो एन.एस.यू.आई. छात्रों के साथ मिलकर बड़ा आंदोलन करेगी। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो उग्र प्रदर्शन किया जाएगा और इसके लिए पूरी तरह से सरकार और प्रशासन जिम्मेदार होंगे। उमरिया जिले में शिक्षा व्यवस्था की यह लचर स्थिति न केवल छात्रों के भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है, बल्कि सरकार की शिक्षा नीति पर भी सवाल खड़े कर रही है। यदि जल्द से जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो यह मुद्दा बड़ा आंदोलन का रूप ले सकता है।
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